कदवाया (ईसागढ़)
ग्राम कदवाया
मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले में स्थित ग्राम कदवाया एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक, धार्मिक एवं पर्यटन स्थल के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यह ग्राम अशोकनगर जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर तथा ईसागढ़ तहसील मुख्यालय से उत्तर दिशा में लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित है।
प्राचीन काल में कदवाया “कदमगुहा”, “कदवही” एवं “कदवाहा” जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता रहा है, जो इसके समृद्ध ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विकास को दर्शाते हैं।
यह स्थल विशेष रूप से अपने प्राचीन मंदिर समूह के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ वर्तमान में एक गढ़ी, बावड़ी, एक मठ (शैव मत के मयूर संप्रदाय से संबंधित) तथा 15 प्राचीन मंदिर विद्यमान हैं, जिनका निर्माण लगभग 9वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य हुआ माना जाता है। ये मंदिर अपनी उत्कृष्ट स्थापत्य कला, सूक्ष्म नक्काशी एवं अद्वितीय मूर्तिकला के कारण दर्शकों को आकर्षित करते हैं। समस्त मंदिर समूह केंद्रीय पुरातत्व विभाग (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) द्वारा संरक्षित स्मारक के रूप में अधिसूचित है, जो इसकी ऐतिहासिक महत्ता को प्रमाणित करता है।
धार्मिक दृष्टि से ग्राम कदवाया स्थित बीजासन देवी मंदिर क्षेत्र में अत्यंत प्रसिद्ध है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, देवी का चरणामृत नेत्रों पर लगाने से नेत्र संबंधी विकारों में लाभ होता है। प्रत्येक चतुर्दशी (चौदस) को यहाँ मेला आयोजित होता है, जिसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन हेतु पहुँचते हैं।
कदवाया अपने पारंपरिक शिल्प के लिए भी जाना जाता है। यहाँ पत्थर से निर्मित शिल-बट्टा एवं पाटा-लुढ़िया स्थानीय स्तर पर विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
ग्राम कदवाया सड़क मार्ग द्वारा अशोकनगर, शिवपुरी एवं चंदेरी जैसे प्रमुख नगरों से सुगमता से जुड़ा हुआ है। निकटतम रेलवे स्टेशन अशोकनगर है, जो यहाँ से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
पर्यटकों की सुविधा हेतु ईसागढ़ तहसील मुख्यालय पर लोक निर्माण विभाग (PWD) का विश्राम गृह उपलब्ध है, जहाँ ठहरने की समुचित व्यवस्था की जा सकती है।
प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक धरोहर एवं प्राचीन स्थापत्य कला का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता ग्राम कदवाया, इतिहास प्रेमियों, शोधकर्ताओं एवं पर्यटकों के लिए एक आकर्षक एवं अविस्मरणीय गंतव्य है।
1. चांदला मंदिर

चांदला मंदिर ग्राम कदवाया में स्थित एक प्रमुख प्राचीन मंदिर है, जो कदवाया ग्राम से सकर्रा जाने वाले मार्ग पर पश्चिम दिशा में अवस्थित है। यह मंदिर मुख्यतः भगवान शिव को समर्पित है तथा कदवाया के मंदिर समूह में इसे प्रारंभिक मंदिरों में से एक के रूप में माना जाता है।
द्रविड़ शैली से समानता रखने वाला यह पूर्वाभिमुख मंदिर भूमि से उभरते हुए जाड्यकुंभ पीठ पर निर्मित है। इसकी प्रमुख विशेषता अपेक्षाकृत कम ऊँचाई वाला पिरामिडाकार शिखर है, जिसका शीर्ष भाग घंटाकार स्वरूप लिए हुए है, जो इसकी स्थापत्य विशिष्टता को और अधिक उभारता है।
मंदिर की योजना में गर्भगृह तथा स्तंभाधारित मंडप का सुव्यवस्थित विन्यास विद्यमान है। शिखर चारों ओर से चैत्य अलंकरण से युक्त है, जो इसकी कलात्मक सुंदरता को दर्शाता है।
मंदिर के जंघा भाग में तीनों दिशाओं में निर्मित देवकुलिकाओं में सूर्य, चामुंडा एवं गणेश की प्रतिमाएँ स्थापित हैं। इसके अतिरिक्त शुकनासिका पर भगवान शिव की आसनस्थ प्रतिमा विराजमान है, जो मंदिर की धार्मिक महत्ता को और अधिक सुदृढ़ करती है।
चांदला मंदिर अपनी प्राचीनता, उत्कृष्ट स्थापत्य कला एवं धार्मिक महत्व के कारण कदवाया के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से एक है तथा यह क्षेत्र के ऐतिहासिक वैभव का सजीव प्रतीक है।
2. गढ़ी स्थित शिव मंदिर

भगवान शिव को समर्पित यह पश्चिमाभिमुखी शिव मंदिर ग्राम के मध्य स्थित गढ़ी परकोटे के भीतर निर्मित है। मंदिर जाड्यकुंभ पीठ पर स्थापित है। इस पीठ के ऊपर खुर एवं कुम्भ पट्टिकाएँ निर्मित हैं, जिनकी देवकुलिकाओं में विविध मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं।
मंदिर की संरचना मुख्यतः गर्भगृह एवं स्तम्भाधारित मण्डप से मिलकर बनी है। इसमें पंचशाखायुक्त गर्भगृह तथा स्तंभों पर आधारित मंडप दृष्टव्य है। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। मंदिर का शिखर वर्तमान में नष्ट हो चुका है।
मंदिर के जंघा भाग में अनेक देवी-देवताओं सहित अष्टदिकपालों का उत्कीर्णन दो पंक्तियों में किया गया है। इस मंदिर की फर्श पर उपलब्ध अभिलेख में अलाउद्दीन ख़िलजी का उल्लेख प्राप्त होता।
3. शिव मन्दिर, तालाब समूह

यह मन्दिर कदवाया ग्राम से बख्तर ग्राम वाले मार्ग पर स्थित है पूर्वाभिमुख यह शिव मन्दिर एक प्राचीन तालाब के तट पर स्थित है जिसमें वर्तमान में खेती की जाती है। यह मन्दिर कदवाया के समस्त मन्दिरों में अलंकरण की दृष्टि से सर्वोच्चतम प्रतिमानों का प्रतिनिधित्व करता है। इसे कद्दवाया का सर्वाधिक विकसित मन्दिर स्वीकार किया जाना चाहिए।
मन्दिर की मूल संयोजना में गर्भगृह, कक्षासन सहित स्तम्भाधारित मण्डप तथा अर्द्धमण्डप सम्मिलित हैं। मन्दिर एक ऊँची जगती पर स्थित है जिस पर पहुंचने हेतु पूर्व दिशा में सोपान व्यवस्था है। वेदीबन्ध में खुर, कुंभ तथा कलश पट्टिकाओं का उत्कीर्णन है। मन्दिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। गर्भगृह का प्रवेश द्वार सप्तद्वार शाखाओं में विभाजित है। ललाट बिम्ब पर शिव युगल का अंकुन है जिनके पार्श्व में ब्रह्मा एवं विष्णु युगल उत्कीर्ण हैं। मण्डप की छत खिले कमल पुष्प से अलंकृत है और चारों और देवी-देवताओं का उत्कीर्णन है। मण्डप के स्तंभ अत्यन्त अलंकृत एवं विभिन मुखाकृतियों वाले भारवाहकों से सुसज्जित है मन्दिर के जंघा भाग में लक्ष्मी-नारायण, उमा-महेश्वर, ब्रह्मा, शिव, भैरवी एवं विष्णु का अंकन है। यह मन्दिर कच्छपघात
स्थापत्यकला का महत्वपूर्ण प्रतिनिधि उदाहरण है।